Nari Shakti Karan Essay Topics

‘महिला सशक्तिकरण’ के बारे में जानने से पहले हमें ये समझ लेना चाहिये कि हम ‘सशक्तिकरण’ से क्या समझते है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो। सामान्यत: विद्यार्थी अपने स्कूल में चर्चा करने या कुछ पैराग्राफ लिखने या निबंध लिखने के लिये इस विषय को लेते है। यहाँ विद्यार्थीयों के मदद के लिये इस विषय पर हम कुछ निबंध उपलब्ध करा रहे है।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध (वीमेन एम्पावरमेंट एस्से)

Get here some essays on Women Empowerment in easy Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, 400 and 800 words.

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 1 (100 शब्द)

अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। परिवार और समाज की हदों को पीछे छोड़ने के द्वारा फैसले, अधिकार, विचार, दिमाग आदि सभी पहलुओं से महिलाओं को अधिकार देना उन्हें स्वतंत्र बनाने के लिये है। समाज में सभी क्षेत्रों में पुरुष और महिला दोनों को लिये बराबरी में लाना होगा । देश, समाज और परिवार के उज्जवल भविष्य के लिये महिला सशक्तिकरण बेहद जरुरी है। महिलाओं को स्वच्छ और उपयुक्त पर्यावरण की जरुरत है जिससे कि वो हर क्षेत्र में अपना खुद का फैसला ले सकें चाहे वो स्वयं, देश, परिवार या समाज किसी के लिये भी हो। देश को पूरी तरह से विकसित बनाने तथा विकास के लक्ष्य को पाने के लिये एक जरुरी हथियार के रुप में है महिला सशक्तिकरण।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 2 (150 शब्द)

भारतीय संविधान के प्रावधान के अनुसार, पुरुषों की तरह सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबर अधिकार देने के लिये कानूनी स्थिति है। भारत में बच्चों और महिलाओं के उचित विकास के लिये इस क्षेत्र में महिला और बाल विकास विभाग अच्छे से कार्य कर रहा है। प्राचीन समय से ही भारत में महिलाएँ अग्रणी भूमिका में थी हालाँकि उन्हें हर क्षेत्र में हस्तक्षेप की इज़ाजत नहीं थी। अपने विकास और वृद्धि के लिये उन्हें हर पल मजबूत, जागरुक और चौकन्ना रहने की जरुरत है। विकास का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को समर्थ बनाना है क्योंकि एक सशक्त महिला अपने बच्चों के भविष्य को बनाने के साथ ही देश का भविष्य का सुनिश्चित करती है।

विकास की मुख्यधारा में महिलाओं को लाने के लिये भारतीय सरकार के द्वारा कई योजनाओं को निरुपित किया किया गया है। पूरे देश की जनसंख्या में महिलाओं की भागीदारी आधे की है और महिलाओं और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये हर क्षेत्र में इन्हें स्वतंत्रता की जरुरत है।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 3 (200 शब्द)

भारत एक प्रसिद्ध देश है जो प्राचीन समय से ही अपनी सभ्यता, संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत, परंपरा, धर्म और भौगोलिक विशेषताओं के लिये जाना जाता है। जबकि दूसरी ओर, ये अपने पुरुषवादी राष्ट्र के रुप में भी जाना जाता है। भारत में महिलाओं को पहली प्राथमिकता दी जाती है हालाँकि समाज और परिवार में उनके साथ बुरा व्यवहार भी किया जाता है। वो घरों की चारदीवारी तक ही सीमित रहती है और उनको सिर्फ पारिवारिक जिम्मेदारीयों के लिये समझा जाता है। उन्हे अपने अधिकारों और विकास से बिल्कुल अनभिज्ञ रखा जाता है। भारत के लोग इस देश को माँ का दर्जा देते है लेकिन माँ के असली अर्थ को कोई नहीं समझता ये हम सभी भारतीयों की माँ है और हमें इसकी रक्षा और ध्यान रखना चाहिये।

इस देश में आधी आबादी महिलाओं की है इसलिये देश को पूरी तरह से शक्तिशाली बनाने के लिये महिला सशक्तिकरण बहुत जरुरी है। उनके उचित वृद्धि और विकास के लिये हर क्षेत्र में स्वतंत्र होने के उनके अधिकार को समझाना महिलाओं को अधिकार देना है। महिलाएँ राष्ट्र के भविष्य के रुप में एक बच्चे को जन्म देती है इसलिये बच्चों के विकास और वृद्धि के द्वारा राष्ट्र के उज्जवल भविष्य को बनाने में वो सबसे बेहतर तरीके से योगदान दे सकती है। महिला विरोधी पुरुष की मजबूर पीड़ित होने के बजाय उन्हें सशक्त होने की जरुरत है।


 

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 4 (250 शब्द)

नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाने के लिये मातृ दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आदि जैसे कई सारे कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे और लागू किये गये है। महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है। अपने देश में उच्च स्तर की लैंगिक असमानता है जहाँ महिलाएँ अपने परिवार के साथ ही बाहरी समाज के भी बुरे बर्ताव से पीड़ित है। भारत में अनपढ़ो की संख्या में महिलाएँ सबसे अव्वल है। नारी सशक्तिकरण का असली अर्थ तब समझ में आयेगा जब भारत में उन्हें अच्छी शिक्षा दी जाएगी और उन्हें इस काबिल बनाया जाएगा कि वो हर क्षेत्र में स्वतंत्र होकर फैसले कर सकें।

भारत में महिलाएँ हमेशा परिवार में कलंक से बचाने हेतु किये गये वध के विषय के रुप में होती है और उचित शिक्षा और आजादी के लिये उनको कभी भी मूल अधिकार नहीं दिये गये। ये पीड़ित है जिन्होंने पुरुषवादी देश में हिंसा और दुर्व्यवहार को झेला है। भारतीय सरकार के द्वारा शुरुआत की गयी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये राष्ट्रीय मिशन के अनुसार 2011 गणना में इस कदम की वजह से कुछ सुधार आया। इससे महिला लिगांनुपात और महिला शिक्षा दोनों में बढ़ौतरी हुई। वैश्विक लिंग गैप सूचकांक के अनुसार, आर्थिक भागीदारी, उच्च शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिये भारत में कुछ ठोस कदम की जरुरत है। जरुरत है कि इसे आरम्भिक स्थिति से निकालते हुए सही दिशा में तेज गति से आगे बढ़ाया जाये।

 

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 5 (300 शब्द)

पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा कहा गया मशहूर वाक्य “लोगों को जगाने के लिये”, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय। लैंगिक भेदभाव राष्ट्र में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अंतर ले आता है जो देश को पीछे की ओर ढ़केलता है। भारत के संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना सबसे प्रभावशाली उपाय है इस तरह की बुराईयों को मिटाने के लिये।

लैंगिक समानता को प्राथमिकता देने से पूरे भारत में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है। महिला सशक्तिकरण के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये इसे हर एक परिवार में बचपन से प्रचारित व प्रसारितकरना चाहिये। ये जरुरी है कि महिलाएँ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रुप से मजबूत हो। चूंकि एक बेहतर शिक्षा की शुरुआत बचपन से घर पर हो सकती है, महिलाओं के उत्थान के लिये एक स्वस्थ परिवार की जरुरत है जो राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है। आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी की वजह से कम उम्र में विवाह और बच्चे पैदा करने का चलन है। महिलाओं को मजबूत बनाने के लिये महिलाओं के खिलाफ होने वाले दुर्व्यवहार, लैंगिक भेदभाव, सामाजिक अलगाव तथा हिंसा आदि को रोकने के लिये सरकार कई सारे कदम उठा रही है।

महिलाओं की समस्याओं का उचित समाधान करने के लिये महिला आरक्षण बिल-108वाँ संविधान संशोधन का पास होना बहुत जरुरी है ये संसद में महिलाओं की 33% हिस्सेदारी को सुनिश्चित करता है। दूसरे क्षेत्रों में भी महिलाओं को सक्रिय रुप से भागीदार बनाने के लिये कुछ प्रतिशत सीटों को आरक्षित किया गया है। सरकार को महिलाओं के वास्तविक विकास के लिये पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में जाना होगा और वहाँ की महिलाओं को सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं और उनके अधिकारों से अवगत कराना होगा जिससे उनका भविष्य बेहतर हो सके। महिला सशक्तिकरण के सपने को सच करने के लिये लड़िकयों के महत्व और उनकी शिक्षा को प्रचारित करने की जरुरत है।


 

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 6 (400 शब्द)

लैंगिक असमानता भारत में मुख्य सामाजिक मुद्दा है जिसमें महिलाएँ पुरुषवादी प्रभुत्व देश में पिछड़ती जा रही है। पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है। ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।

महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है। अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।

महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है। एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।

मनुष्य, आर्थिक या पर्यावरण से संबंधित कोई भी छोटी या बड़ी समस्या का बेहतर उपाय महिला सशक्तिकरण है। पिछले कुछ वर्षों में हमें महिला सशक्तिकरण का फायदा मिल रहा है। महिलाएँ अपने स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी, तथा परिवार, देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी को लेकर ज्यादा सचेत रहती है। वो हर क्षेत्र में प्रमुखता से भाग लेती है और अपनी रुचि प्रदर्शित करती है। अंतत: कई वर्षों के संघर्ष के बाद सही राह पर चलने के लिये उन्हें उनका अधिकार मिल रहा है।


 

महिला सशक्तिकरण पर निबंध 7 (800 शब्द) (दीर्घ निबंध)

महिला सशक्तिकरण क्या है ?

महिला सशक्तिकरण को बेहद आसान शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है कि इससे महिलाएँ शक्तिशाली बनती है जिससे वो अपने जीवन से जुड़े हर फैसले स्वयं ले सकती है और परिवार और समाज में अच्छे से रह सकती है। समाज में उनके वास्तविक अधिकार को प्राप्त करने के लिये उन्हें सक्षम बनाना महिला सशक्तिकरण है।

भारत में महिला सशक्तिकरण की क्यों जरुरत है ?

जैसा कि हम सभी जानते है कि भारत एक पुरुषप्रधान समाज है जहाँ पुरुष का हर क्षेत्र मंक दखल है और महिलाएँ सिर्फ घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाती है साथ ही उनपर कई पाबंदीयाँ भी होती है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत आबादी केवल महिलाओं की है मतलब, पूरे देश के विकास के लिये इस आधी आबाधी की जरुरत है जो कि अभी भी सशक्त नहीं है और कई सामाजिक प्रतिबंधों से बंधी हुई है। ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि भविष्य में बिना हमारी आधी आबादी को मजबूत किये हमारा देश विकसित हो पायेगा। अगर हमें अपने देश को विकसित बनाना है तो ये जरुरी है कि सरकार, पुरुष और खुद महिलाओं द्वारा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाये।

महिला सशक्तिकरण की जरुरत इसलिये पड़ी क्योंकि प्राचीन समय से भारत में लैंगिक असमानता थी और पुरुषप्रधान समाज था। महिलाओं को उनके अपने परिवार और समाज द्वार कई कारणों से दबाया गया तथा उनके साथ कई प्रकार की हिंसा हुई और परिवार और समाज में भेदभाव भी किया गया ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी दिखाई पड़ता है। महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी। आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।

भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है। प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।

पुरुष पारिवारिक सदस्यों द्वारा सामाजिक राजनीतिक अधिकार (काम करने की आजादी, शिक्षा का अधिकार आदि) को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। महिलाओं के खिलाफ कुछ बुरे चलन को खुले विचारों के लोगों और महान भारतीय लोगों द्वारा हटाया गया जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्यों के लिये अपनी आवाज उठायी। राजा राम मोहन रॉय की लगातार कोशिशों की वजह से ही सती प्रथा को खत्म करने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए। बाद में दूसरे भारतीय समाज सुधारकों (ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आचार्य विनोभा भावे, स्वामी विवेकानंद आदि) ने भी महिला उत्थान के लिये अपनी आवाज उठायी और कड़ा संघर्ष किया। भारत में विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिये ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने लगातार प्रयास से विधवा पुर्न विवाह अधिनियम 1856 की शुरुआत करवाई।

पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिये सरकार द्वारा कई सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाए और लागू किये गये है। हालाँकि ऐसे बड़े विषय को सुलझाने के लिये महिलाओं सहित सभी का लगातार सहयोग की जरुरत है। आधुनिक समाज महिलाओं के अधिकार को लेकर ज्यादा जागरुक है जिसका परिणाम हुआ कि कई सारे स्वयं-सेवी समूह और एनजीओ आदि इस दिशा में कार्य कर रहे है। महिलाएँ ज्यादा खुले दिमाग की होती है और सभी आयामों में अपने अधिकारों को पाने के लिये सामाजिक बंधनों को तोड़ रही है। हालाँकि अपराध इसके साथ-साथ चल रहा है।

कानूनी अधिकार के साथ महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये संसद द्वारा पास किये गये कुछ अधिनियम है - एक बराबर पारिश्रमिक एक्ट 1976, दहेज रोक अधिनियम 1961, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956, मेडिकल टर्म्नेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1987, बाल विवाह रोकथाम एक्ट 2006, लिंग परीक्षण तकनीक (नियंत्रक और गलत इस्तेमाल के रोकथाम) एक्ट 1994, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन शोषण एक्ट 2013।

निष्कर्ष

भारतीय समाज में सच में महिला सशक्तिकरण लाने के लिये महिलाओं के खिलाफ बुरी प्रथाओं के मुख्य कारणों को समझना और उन्हें हटाना होगा जो कि समाज की पितृसत्तामक और पुरुष प्रभाव युक्त व्यवस्था है। जरुरत है कि हम महिलाओं के खिलाफ पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव लाये।

 

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स्त्री को सृजन की शक्ति माना जाता है | इस सृजन की शक्ति को विकसित – परिष्कृति कर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, विचार, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, अवसर की समानता का सुअवसर प्रदान करना ही महिला सशक्तिकरण का आशय है |

महिला सशक्तिकरण पर निबंध : Women Empowerment Essay in Hindi

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

महिला सशक्तिकरण के बिना देश व समाज में नारी को असली आजादी हासिल नहीं हो सकती | वह सदियों पुरानी मूढ़ताओं और दुष्टताओं से लोहा नहीं ले सकती | बन्धनों से मुक्त होकर अपने निर्णय खुद नहीं ले सकती | स्त्री सशक्तिकरण के अभाव में वह इस योग्य नहीं बन सकती कि स्वयं अपनी निजी स्वतंत्रता और अपने फैसलों पर आधिकार पा सके |

महिला अधिकारों और समानता का अवसर पाने में महिला सशक्तिकरण ही अहम भूमिका निभा सकती है | क्योंकि स्त्री सशक्तिकरण महिलाओं को सिर्फ गुजारे – भत्ते के लिए ही तैयार नहीं करती बल्कि उन्हें अपने अंदर नारी चेतना को जगाने और सामाजिक अत्याचारों से मुक्ति पाने का माहौल भी तैयारी करती है |

बेहतर समाज के निर्माण में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता को महसूस करते हुए  विश्व पटल पर नारी शक्ति को जागृत करने के लिए हर वर्ष दुनिया भर में 8 मार्च का दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है | नारी जागरण को समर्पित इस दिवस पर एक थीम तय की जाती है | यह थीम हर साल अलग – अलग रखी जाती है |

इस वर्ष 2017 की थीम है ” Be bold for change ” यानि ‘ महिलाओं की स्थिति में सुधार करने के लिए महिलाओं को ही बोल्ड होकर खुद आगे बढ़ना होगा ‘ हैं | क्योंकि नारी विश्व की चेतना है, माया है, ममता है, और मुक्ति है | दुसरे शब्दों में कहे तो जीवन मात्र के लिए करुणा सजाने वाली महाप्रकृति का नाम नारी है |

हमारे आदि – ग्रंथों में नारी को गुरुतर मानते हुए यहाँ तक घोषित किया गया है  – “यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता |” अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते है |

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पारम्परिक विचारधारा में प्राचीन काल से ही स्त्री की पत्नी और माता की भूमिका में प्रशंसा तो की गयी है, किन्तु मानवीय रूप से उसे सदैव से ही बहुत हेय समझा गया है | नारी को पुरुष का पुछल्ला मात्र मानकर सामाजिक उत्पीड़न किया जाता रहा है |

रोमिला थापर कहती है, “पर्याप्त अधिकार और स्वतंत्रता की स्थिति से लेकर उतनी ही अधिक अधीनता की स्थिति तक उसमें व्यापक परिवर्तन आते रहे |”

नारी की स्थिति में कृषक समाजों के विकास और राज्यों के जन्म के साथ निर्णायक गिरावट आने लगी | इसमें हिन्दू समाज में जाति – सोपान नाम का केंद्रीय संगठनकारी सिद्धांत पुरुष प्रधान की विचारधारा की मुख्य भूमिका रही | इस विचारधारा के कारण शूद्रों और स्त्रियों दोनों को वैदिक अनुष्ठानों से वंचित कर दिया गया | सार्वजनिक जीवन जब जब पुरुषों का कर्मक्षेत्र बन गया, तो स्त्रियाँ घरों तक सीमित होकर रह गई |लेकिन यदि यह जीवन का एक सच था, तो दूसरी ओर यह बात भी सच थी कि स्त्रियों का अलगाव कोई निरपवाद, सार्वभौमिक प्रथा न थी |

Women Empowerment in Hindi

समय – समय पर राजनितिक, समाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में धनी और निर्धन दोनों वर्गों की स्त्रियों की अत्यधिक सार्वजिनक सक्रियता के प्रमाण भी मिलते है | रजिया सुन्तल,अहिल्याबाई, नूरजहाँ, गुलबदन, हर्रम बेगम आदि स्त्रियों के चरित्र उदहारण स्वरुप हैं |

महिला शक्ति की सार्वजनिक सक्रियता का प्रमाण औपनिवेशिक काल में हुए 1857 के विद्रोह में भी दिखाई पड़ता है | रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, रानी राजेश्वरी देवी,सुगरा बीबी, अदा देवी, आशा देवी गुज्जर, भगवानी देवी, रणबीरी बाल्मिकी, झलकारी बाई, अवंती बाई, महाबिरा देवी आदि वीरंगनाओं ने भाग लेकर समाज में सदैव उपेक्षित समझी जाने वाली महिलाओं की वीरता, साहस और सक्रिय भूमिका को बाहर लाकर राष्ट्र, समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा प्रदान किया |

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19 वी सदी में सामाजिक सुधार आंदोलन की बात करें या 20वी सदी के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की, नारी ने पुरुषों के साथ भाग लेकर पुरानी मान्यताओं को दरकिनार करते हुए अपनी शक्ति का जबदस्त अहसास कराया | 

आज हमारे मानस में नारी शक्ति की पहचान स्वतंत्र, जिज्ञासु और आत्मविश्वास से भरी स्त्री की तस्वीर न उभर कर एक ऐसी संघर्षशील स्त्री की तस्वीर उभरती है, जिसके घरेलू दायित्व वही के वही हैं | अब परिस्थियों की मांग है कि आत्मदया और आत्मपीडन के तार पर साधा हुआ अपने पारम्परिक स्वरूप के प्रति आक्रोश एक स्तर के बाद बंद हो |

बीती बातों को याद करने या दोहराने से महिलाओं की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला | देश की आधी आबादी को अब अपने सत्य से वृहत सत्य की परिधि तक जाना होगा | यह देखना होगा कि किसी भी महत्वपूर्ण क्षेत्र में महिलाओं के कार्य करने या न करने से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या विशेष फर्क पड़ेगा | लेकिन स्त्री सशक्तिकरण का सारा रास्ता एक लम्बी छलांग लगाकर एक बार में पार नहीं किया जा सकता, उसे कदम – कदम पर चलकर ही पार किया जा सकता है |

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आज सम्पूर्ण व्यवस्था में जिस आमूल रूप से स्त्री सम्बन्धी मुद्दों के पुनर्मूल्यांकन और विश्लेषण की जरुरत है, उस निर्णय के अधिकार को पुरुष व्यवस्था ने अभी तक अपने पास रखा है | स्त्री की अस्मिता का संघर्ष दोहरे स्तरों पर है क्योंकि अस्मिता का संघर्ष केवल अपने होने अपनी शक्ति की पहचान करने मात्र से नहीं जुड़ा है बल्कि अस्मिता का संघर्ष और विकास का मुद्दा एक दूसरे से जुड़ा हुआ है |

वर्तमान में महिलाएँ उत्पादन एवं पुनरुत्पादन के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं फिर भी द्रुत आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तनों में महिलाओं का योगदान अदृश्य तथा मान्यता रहित रहा क्योंकि कि उनसे स्टीरियों टाइप प्रक्रिया और पारम्परिक भूमिका निभाने की आशा की जाती रही |

महिलाओं की आर्थिक भूमिका की उपेक्षा की जाती रही जबकि सशक्तिकरण के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना परम आवश्यक है | और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए महिलाओं का शिक्षित होना बेहद जरुरी है लेकिन भारत में आज भी महिलाओं के लिए पर्याप्त शिक्षा व्यवस्था की कमी है |

एक शिक्षित महिला ही इस महा अभियान का नेतृत्व कर सकती है | इसके अतिरिक्त नारी का स्वास्थ्य, समाज में व्याप्त यौन हिंसा, वेश्यावृति की बढ़ती घटनाओं को रोकना कारगर उपाय है |

महिलाओं को उनकी क्षमता और योग्यता के अनुसार विकास का पूर्ण अवसर प्रदान करना और नारी सशक्तिकरण राष्ट्रीय नीति को अपडेट करने की भी जरुरत है | साथ ही महिलाओं के प्रति लोगों की सोच में बदलाव की भी आवश्यकता है |

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नारी मनुष्य वर्ग का अभिन्न अंग है | उसके स्थिति का समाज पर और समाज का उसकी स्थिति पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है | समाज निर्माण में मात्र पुरुष ही भाग ले और नारी को घर के पिंजरे में ही कैद रखा जाए, यह अनुचित है | इसमें नारी वर्ग को और समाज को तो हानि है ही, प्रतिबन्ध लगाने वाले पुरुष भी उस हानि से नहीं बच सकते |

नारी चेतना रूप है | वह परिवार संचालन का उत्तरदायित्व संभालते हुए भी समाज निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है |

दुनिया के किसी भी देश व समाज का विकास महिला सशक्तिकरण के अभाव में संभव नहीं है | समाज की उन्नति के लिए स्त्री को विकास के लिए स्वच्छ और उपयुक्त पर्यावरण उपलब्ध कराना पूरी मनुष्य जाति का कर्तव्य है |

समाज में नारी और पुरुष दोनों को एक बराबरी का दर्जा मिलाना चाहिए | जिस दिन महिला और पुरुष के बीच का भेद – भाव खत्म हो जायेगा उस दिन हमारे समाज में एक नये युग का आरम्भ हो जाएगा | लेकिन आज भी सामाजिक क्षेत्र में महिलाओं को शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ रहा है |

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भारतीय राष्ट्रीय कानून के तहत 2001 राष्ट्रीय महिला नीति पारित की गयी | पुरुषों के समान सभी क्षेत्रों में महिलाओं को अधिकार देने के लिए कानून बनाए गए लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि महिलाओं को अधिकार देने के नाम पर राष्ट्रीय महिला नीति को बने 15 वर्ष से ज्यादा समय बीत गए पर आज भी महिला सशक्तिकरण नहीं हुआ | नारी सशक्तिकरण के नारे और भाषण तो दीए जाते है लेकिन हकीकत में आज समाज में महिला की हालत बेहद चिंताजनक है |

आर्थिक और प्रौद्योगिक परिवर्तनों के बावजूद महिलाओं के प्रति हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है | यह एक विचित्र विडम्बना है कि जो महिला घर, परिवार और समाज की सुरक्षा की बुनियादी कड़ी है आज उसी के खिलाफ हिंसा होती है | सच तो यह है कि एक सभ्य समाज में महिलाओं के प्रति हिंसा किसी भी तरह स्वीकार एवं क्षमा योग्य नहीं है |

भारतीय प्राचीन संस्कृति में नारी को स्वयं शक्ति स्वरूपा कहा गया है | नारी के उसी शक्ति को और भी सशक्त बनाने के लिए महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता है | जिससे वह सड़क से लेकर घर तक, स्कूल से लेकर दफ्तर तक हर जगह सिर उठाकर चल सके, समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णय खुद ले सके | वह इतनी सशक्त हो कि उसकी तरफ कोई गलत नजर से देखने की हिम्मत न कर सके |

नारी सशक्तिकरण के द्वारा ही  स्वस्थ्य समाज का निर्माण किया जा सकता है  | इस बात को दुनिया भर के सभी देशों ने माना है और इसलिए देश के संविधान में भी महिलाओं को हर क्षेत्र में बिना किसी भेद भाव के पुरुषों के समकक्ष अधिकार दिए गए है | महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए महिला सशक्तिकरण योजना “राष्ट्रीय महिला आयोग” तथा विभिन्न राज्यों में “राज्य महिला आयोग” की स्थापना की गई है जो सुधार के लिए अनवरत प्रयासरत हैं |

महिलाओं को मुख्य धारा में लाने के लिए हमारी सरकार ने वर्ष 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष के रूप में घोषित किया | यह बात बिलकुल सत्य है कि महिलाओं की आधी आबादी के हर क्षेत्र में सशक्त होने पर ही देश सशक्त होगा और सही मायने में उसका सम्पूर्ण विकास होगा |

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यद्यपि नारी का महत्व उसके त्याग, तपस्या, सेवा-भाव और समर्पण में निहित है | बिना इन भावों के नारी नारी कहाँ रह जाती है और शायद इसीलिए पुरुष को कठोर कहा गया है तथा स्त्री को कोमल | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि स्त्री अन्तर्जगत का उच्चतम विकास है जिसके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए है | इसलिए प्रकृति ने भी उसे इतना सुंदर मनमोहक आवरण दिया है |

रमणी रूप की स्वामिनी नारी का जीवन नि:संदेह सेवा और समर्पण का सार है | लेकिन इस समर्पण को समझने वाला सह्रदय पुरुषों की संख्या बहुत कम है | ज्यादातर पुरुष नारी की इन विशेषताओं की उपेक्षा कर उसकी कोमल भावनाओं को उसकी विवशता समझते है और इस प्रकार अपनी मानसिक संकीर्णता का परिचय देते है | यह त्रासदी आधे भाग की है | इसी आधी आबादी को आगे लाना और सशक्त बनाना महिला सशक्तिकरण का उद्देश्य है |

हमेशा से नारी सशक्तिकरण के मार्ग में उसका शारीरिक रूप से कमजोर होना बाधक बनता रहा है | इस बात को जयशंकर प्रसाद जी ने भी महसूस कर अपनी रचना में लिखा है –

यह आज समझ तो पाई हूँ

दुर्बलता में मैं नारी हूँ |

अवयव की सारी कोमलता

लेकर मैं सबसे हारी हूँ ||”

लेकिन इस सबके बावजूद नारी को जहाँ भी आर्थिक, सामाजिक, राजनितिक क्षेत्रों में पुरुषों के समान अवसर प्राप्त हुए है, वहाँ उसने अपने आप को पुरुषों के समकक्ष श्रेष्ठ साबित कर दिखाया है | आज स्त्री की छवि भले ही ‘पवित्र देवी आदरणीय’ की नहीं है लेकिन भारतीय संस्कृति के इतिहास के पन्ने पलट कर देखे तो नर और नारी को गृहस्थी की गाड़ी चलाने के लिए दो पहियों की भांति माना गया है | एक के बिना दूसरा अधूरा तथा आश्रयहीन था |

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यदि विभिन्न कालों के आधार पर भारतीय स्त्रियों की स्थिति पर दृष्टि डाले तो हम पायेंगे कि वैदिक काल में नारी पग – पग पर पुरुष की सहभागिनी हुआ करती थी | किन्तु उत्तर वैदिक युग में नारी की दशा गिरती गई | मध्यकाल आते – आते स्त्री जाति की दशा और भी दयनीय हो गई | इस काल में महिलाओं को अबला माना जाता था, जिसका जिक्र कवि मैथलीशरण ने अपनी रचना में की है –

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी

पर बदलते भारतीय समाज में नारी की स्थिति भी परिवर्तनीय रही है | कभी नारी को श्रद्धा के साथ पूजा गया तो कभी दासता के बंधन में जकड़कर पशुवत व्यवहार किया गया | प्रसिद्ध लेखिका सिमोन कहती है कि –

स्त्री की स्थिति अधीनता की है स्त्री सदियों से ठगी गई है और यदि उसने कुछ स्वतंत्रता हासिल की है तो बस उतनी ही जितनी पुरुष ने अपनी सुविधा के लिए उसे देनी चाही |”

बदलते समय के साथ आज की नारी पढ़ – लिख कर स्वतंत्र है | वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है तथा स्वयं अपना निर्णय लेती है | अब वह चारदीवारी से बाहर निकलकर देश के लिए विशेष महत्वपूर्ण कार्य करती है |

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

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वर्ष 2016 में तुर्की के इस्तांबुल में हजारों महिलाओं ने उस बिल का विरोध किया जिसमें यह प्रावधान था कि यदि किसी नाबालिक लड़की से दुष्कर्म का आरोपी उससे शादी कर लें तो उसे सजा नहीं दी जाएगी | महिलाओं के आवाज उठाने पर इस बिल को वापस ले लिया गया |

भारत में भी ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जिन्होंने समाज में बदलाव और महिला सम्मान के लिए अपने अन्दर के डर को जमींदोज कर दिया | ऐसी ही एक मिसाल बनी सहारनपुर की अतिया साबरी | अतिया पहली ऐसी मुस्लिम महिला है जिन्होंने तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद किया | तेजाब पीड़ितों के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाली वर्षा जवलगेकर के भी कदम रोकने की नाकाम कोशिश की गई लेकिन उन्होंने इंसाफ की लड़ाई लड़ना नहीं छोड़ा | हमारे देश में ऐसे कई उदहारण है जो महिला सशक्तिकरण का पर्याय बन रही है |

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आज देश में नारी शक्ति को सभी दृष्टि से सशक्त बनाने के प्रयास किये जा रहे है | इसका परिणाम भी देखने को मिल रहा है |महिलाएं जागरूक हो चुकी है |इन्होंने उस सोच को बदल दिया है कि वह घर और परिवार में से किसी एक जिम्मदारी को ही बेहतर निभा सकती है |

इक्कीसवीं सदी नारी जीवन में सुखद सम्भावनाओं की सदी है | इसके उदीयमान स्वर्णिम, प्रभात की झाकियाँ अभी से देखने को मिल रही है | यह हर क्षेत्र में आगे आने लगी है | आज की नारी अब जाग्रत और सक्रीय हो चुकी है | युगदृष्टा स्वामी जी ने बहुत अच्छी बात कही है “नारी जब अपने ऊपर थोपी हुई बेड़ियों एवं कड़ियों को तोड़ने लगेगी तो विश्व की कोई शक्ति उसे नहीं रोक पायेगी” | वर्तमान में नारी ने रुढ़िवादी बेड़ियों को तोड़ना शुरू कर दिया है | यह एक सुखद संकेत है | लोगों की सोच बदल रही है, फिर भी इस दिशा में और भी प्रयास अपेक्षित है |

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